Wednesday, October 14, 2009


विजय पिपासा

यदा कदा या सदा सदा,
क्यों तेरे मन में क्लेश जगा
जीवन की क्षणभंगुरता में,
आत्मग्लानि और द्वेष भगा

एक मात्र कटुपल की निंदा,
जो तेरा उपहास करे
कर स्मरण हर्षित स्मृतियों का,
जो संग तेरे उल्हास भरे

समय कुटिल हो, भाग्य जटिल हो,
लक्ष्य तेरा अटल अविजित हो
एक एक कर पग भरता जा,
ध्यान रहे बस चित पुलकित हो

भाग्य द्वार पे कपट प्रहरी,
प्रतिपल द्रिष्टि रखते हैं
हर प्रयत्न पे तेरी अच्लित,
प्रेरणा की पुष्टि करते हैं

काल चक्र के बंधन में जब,
लगे अंत हो जायेगा
कर स्वतंत्र ले मन अपना तू,
तन स्वतः स्वतंत्र हो जायेगा

कभी गिरा जो नीर गगन से,
मिटटी में मिल जाता है
कभी वही जब पड़े सीप पे,
मोती बन इठलाता है

विजय श्री एक मृग तृष्णा है,
बुझ कर भी जो बुझे नहीं
ले टटोल अंतर्मन अपना,
छुपी मिलेगी तुझे वहीँ

~ अनुपम